लोगों मे चिंता व्याप्त है कि आखिर टीएमसी की जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं, समर्थकों और मतदाताओं का क्या होगा?

भाजपा 199 तक पहुँच सकती थी यदि बीजेपी को 3.1% वोट और मिल जाता, बीजेपी को कुल 38.1% वोट मिले। 3.1% वोट से 122 और सीटें मिलना संभव था। और 122 सीटें टीएमसी ही गंवा बैठती। टीएमसी सरकार जरूर बना रही है, जीत का जश्न भी मना रही है लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव मे सिर्फ पाया ही पाया है क्यूंकि बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। टीएमसी को 213 सीटें मिलीं हैं और 47.9% का जनाधार मिला है।

लोगों मे चिंता व्याप्त है कि आखिर टीएमसी की जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं, समर्थकों और मतदाताओं का क्या होगा?


देश मे उन लोगों ने हर उस राज्यों मे राहत की सांस ली है जहां की सरकार की काम काज मे लापरवाही के कारण अव्यवस्था है और कोविड के मरीजों को ऑक्सिजन नहीं मिल रहा है। ये सभी राज्य गैर बीजेपी शासित प्रदेश है और उन प्रदेशों के क्षेत्रीय दलों को अब प्रधानमंत्री मोदी के सामने चुनौती बनी ममता मे भावी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार दिखने लगा है। बहुत जल्दी फिर से एक क्षेत्रीय दलों का समीकरण बैठेगा और एक महा गठनबधन भी बन पड़ेगा। 

आज भारत मे लोकतंत्र की पुनर्स्थापना को प्रमाणित करने का विशेष दिन है नहीं तो विपक्षी पार्टियों ने तो इसकी पुनर्बहाली के लिए अमेरिका के सामने आवेदन लगाकर मदद मांगनी शुरू कर दी थी। राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक अस्थिरता और असमर्थता को जताते हुए अमेरिका से मोदी सरकार के कार्यकलापों पर हस्तक्षेप करने की बात कही थी जिसका देश भर मे जमकर निंदा किया गया था। आज दूसरी महत्वपूर्ण बात विपक्षियों के लिए ये भी है कि बिहार में आडवाणी जी की रथ यात्रा को मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रोक कर अपना राजनैतिक कद बढ़ा लिया था और आज भाजपा की विजय रथ को रोक कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ने अपना राजनैतिक कद बढ़ा लिया है हालांकि वह स्वयं नंदीग्राम से अपनी सीट नहीं बचा पाई और शुभेन्दु अधिकारी के सामने परास्त हो गई लेकिन यह बहुत बड़ी खबर इसलिए नहीं है क्यूंकि वह अब कहीं से भी किसी भी जगह से जीत कर आ सकती है। 

अब यहाँ से ममता बनर्जी के सामने दो-मुहान रास्ता है। पहला रास्ता बंगाल की राजनीति की ओर जाता है जहां पर 30% एकत्रित मुस्लिम मतदाताओं ने 70% हिन्दू बाहुल्य को बड़े आसानी से परास्त कर दिया। सरकार उनके पक्ष मे काम करने वाली ममता बनर्जी की ही बन गईं। अब दुर्गा पूजा का पंडाल कैसे लगेगा, सरस्वती पूजा की जाएगी कि नहीं, मंदिरों मे पुजारियों को भत्ता मिलेगा कि नहीं यह सब अब 30% मुस्लिम मतदाताओं के हाथ मे तय होना अब निश्चित हो गया है। पश्चिम बंगाल मे तुष्टीकरण तो अब जमकर ही होगी, कट मनी का व्यापार ज़ोरों से चलेगा। सीएए लागू नहीं होगा, बंगलादेशी को भारत की नागरिकता मिलेगी, घुसपैठिये और अधिक संख्या मे बंगाल मे आएंगे क्यूंकि 2026 की चुनाव इस बार का चुनाव से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा।

अब अगले पाँच साल मे बंगाल मे बीजेपी के समर्थकों का क्या होगा? यह बीजेपी के हाथ मे नहीं है क्यूंकि चुनाव परिणाम के रुझान आते भर मे बंगाल मे बीजेपी के दफ्तरों के सामने टीएमसी के कार्यकर्ता और भद्रलोग जीत का जश्न मानाकर उन्हे हिंसा के लिए उकसा रहे थे। और कुछ समय बाद यह खबर भी आने लगी कि बीजेपी के दफ्तरों मे आग लगा दी गई है। अब यह एक नियमित खबर बनेगी जिसे देखकर किसी भी दलों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा सिवाय बीजेपी के।       

दूसरा रास्ता ममता बनर्जी का खुलता है केंद्र की तरफ। मुझे ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी अब बहुत जल्द ही केंद्र की तरफ रुख करेंगी। प्रधानमंत्री मोदी को राजनैतिक रूप से परास्त करने का नया सूत्र और समीकरण बनाया जाएगा और बिठाया जाएगा क्यूंकि यह अब विपक्षी गुट मे अवधारणा सत्यापित हो चुकी है कि मोदी और बीजेपी को हटाने के लिए ममता सबसे बड़ी नेता अब इस जीत के बाद बन चुकी है। 

rahul gandhi

मैं काँग्रेस की बात नहीं करूंगा क्यूंकि खराब प्रदर्शन पर अभी कुछ भी लिखना समय की बर्बाद करना है। अभी समय उनका है कि वो अब आत्म मंथन मे मोदी और बीजेपी को हराने के लिए दिल्ली के बाद बंगाल मे जिस तरह से आत्म समर्पण कर मत्था टेक दिया था यही कराते रहना है? क्या काँग्रेस की यही आत्मसमर्पण की राष्ट्रीय नीति बन जाएगी जब सभी क्षेत्रीय दल अपना महागठबंधन बनाने मे सफल हो जाएंगे? 

यह स्पष्ट है कि इस बार महागठबंधन मे काँग्रेस को जगह नहीं मिलेगी क्यूंकि काँग्रेस का कद अब क्षेत्रीय दलों से भी बौना हो चुका है और इस पार्टी को सभी अब वोट कटुआ पार्टी के रूप मे ही देखती है। और जब जब काँग्रेस चुनाव मे जहां जहां आत्मसमर्पण करती है वहाँ बीजेपी की हार हो रही है। 

फॉर्मूला तो मिल गया है बस अब समीकरण बनना बाकी है। बीजेपी के सामने चुनौती अब यह है कि राज्यों के चुनाव मे मोदी जी का चेहरा के साथ साथ किसी क्षेत्रीय नेता का कद बड़ा होना जरूरी है। आने वाले चुनाव से पहले बीजेपी उन सब चेहरों को कैसे लोकप्रिय बनाती है या नहीं बनती है यह देखना होगा। 

पहली सबक तो बीजेपी के लिए यही होगा क्यूंकि मोदी जी की लोकप्रियता राज्यों को चुनाव जीतने मे मदद नहीं कर रही। भीड़ वोट में बदलते नजर नहीं आ रहे हैं और यह दिल्ली के बाद बंगाल मे दूसरी बार हुआ है हालांकि यह एक सरल मार्ग नहीं है।   

सिर्फ समय की प्रतीक्षा हैकि कब यह सब कुछ होता हुआ नज़र आएगा।