मोंटू की पलटन मे गायक अमन त्रिखा का इमोशनल सॉन्ग - मम्मी पापा है, फिर कमी सी क्यूँ है? सुनकर सभी के गले रुँध जाते है

खुद के पैसे लगाकर समाज और बाल कल्याण के मुद्दे पर फिल्म बननेवाले और अब तक 29 अवार्ड्स पाने वाले फिल्म लेखक और निर्देशक विक्रांत मोरे की सराहना करना और उनकी फिल्म को देखना जरूरी है तभी अच्छी फिल्म बननेवाले जिंदा रह सकेंगे... वरना टैलेंटेड लोगों को या तो बॉलीवुड माफिया मार देती हैं या फिर नंग-धड़ंगो की फिल्म देखनेवाले दर्शक... क्या हमारे बच्चे इन नंगे-पुंगे नशेड़ियों और गंजेडियों की फिल्मे देखकर ही अपना सुनहरा बचपन अभिशप्त कर लेंगे ....आइए विक्रांत मोरे जी का साथ दें और अच्छी फिल्मों को भविष्य दें...

मिहिका, रोहित, अनन्या, नूपुर और ओम एक ही मोहल्ले के बच्चे है जिनके माता-पिता का समाज मे रुतबा है, बड़े कद के व्यक्ति है और अपने अपने बच्चों की खुशियाँ के लिए दिन-रात एक कर जी तोड़ मेहनत करते है और उन्हे सारी खुशियों के देने के लिए हर प्रकार का खिलौना, गेम्स, आदि चीजें लातें है लेकिन फिर  भी आखिर इस फिल्म मे ऐसा क्या होता हैकि इस फिल्म के लेखक-निर्देशक विक्रांत मोरे ने यह गीत बनवाया है जिसके बोल है, "मम्मी पापा है, फिर भी कमी सी क्यूँ है?'

इस गीत को सुनकर सभी के गले रुँध जाते है। सबके चेहरे पर एक ही सवाल होता है मैंने इस बात पर क्यूँ नहीं ध्यान दिया? सबके चेहरे पर छाई खामोशी को आसानी से सुना जा सकता है, मनोभाव को सरलता से पढ़ा जा सकता है, और यह गारंटी है कि फिल्म को देखकर कर दो मिनट के लिए रुककर अपने जीवन जीने की शैली को आधुनिक सूत्रों से पिरोये हुए बुनियाद को धराशायी कर नए और परंपरागत रूप से जांचा और परखा व्यवहारपूर्ण जीवन शैली को ओर जाने के लिए इंगित करता है। 

मुंबई जैसे बड़े शहरों मे हर बात के लिए पैसे पर उपलब्ध सेवाएँ भी कम पड़ती है इस फिल्म मे। इस फिल्म मे बच्चे मेधावी है, मेहनती है, सामान्य है, और स्वस्थ्य है लेकिन परिस्थिति है जो हमे सोचने पर मजबूर करती है। यह भी बता दूँ कि फिल्म मनोरनजन से भरपूर भी है, मोंटू, के के गोस्वामी, पंकज बेरी, जैसे दिग्गज कलाकारों ने फिल्म मे अपने अभिनय का हूनर दिखाया है और छोटे बच्चों ने जो कमाल दिखाया है वह अति प्रशंसनीय है। निर्देशन विक्रांत मोरे ने भी इसने पूरी तरह काम लेने मे सफल रहे है। 

बच्चों के माध्यम से, फिल्म निर्देशक बच्चों की समस्याओं को उजागर करते है और इस समस्या के मूल मे है उनके अपने अभिभावक जिनके पास पैसा है, देने के लिए सारी सुविधाएं है, प्यार भी है पर कमी क्या है? क्यूँ परेशान है बच्चे? क्यूँ सवाल पुछते है अपने माता-पिता से बच्चे? क्यूँ बच्चों को अपने माता पिता को समझाने की आवश्यकता होती है? क्यूँ बच्चे निराश है जबकि मम्मी भी है पापा भी है फिर भी कमी सी क्यूँ हैं?

मासूमियत से  भरे इन बच्चों मे सबने बढ़-चढ़कर काम किया है। ओम का पात्र निभाने वाले अयान सैयद ने तो अपने पहली ही फिल्म मे ऐसा छाप छोड़ा है जो कभी भुलाया नहीं जा सकता। मिहिरा ने जिस प्रकार का अभिनय किया है वह बचपन मे मासूम वाली उर्मिला मटोंडकर की तरह है और साथ ही नूपुर और अनन्या ने बेहतरीन काम किया है। 

फिल्म की स्क्रिप्ट ही हीरो है और इसकी कहानी ही मुख्य किरदार है जो पूरे समय दर्शकों को बांध कर रखती है। कैमरा और निर्देशन दोनों ही आसानी से कहानी को दिखाने मे सक्षम है। 

फिल्म 1 घंटे 40 मिनट की है और दर्शकों को बांधकर रखती है और देश विदेश के मंचो पर प्रदर्शित हो चुकी है और अब तक दो दर्जन से ज्यादा परितोषिक (अवार्ड्स) और सम्मान प्राप्त कर चुकी है। 

भारत मे यह फिल्म भारतटाकीज़ (bharattalkiez.com) पर प्रदर्शित हो रही हैजो भारत की सबसे पहली एसी ओटिटी चैनल है जो केवल और केवल उन फिल्मों को प्रदर्शित करनेवाली है जिन फिल्मों को अवार्ड्स मिल चुकी है और समाज अथवा महिला और बाल कल्याण के क्षेत्र मे महत्वपूर्ण योगदान देती है। 

फिल्म के निर्माता - निर्देशक विक्रांत मोरे जल्दी इस फिल्म को शिक्षा मंत्रालय और समाज कल्याण, महिला और बाल विकास कल्याण मंत्रालय मे प्रदर्शन करने के लिए आवेदन भेजने वाली है।