मेरे लिए चुनौती है अनर्गल व अश्लील फिल्मों के दौर मे अच्छी कहानी दिखाना

सेंसर बोर्ड तो सिर्फ छोटे प्रॉडक्शन कंपनियों के लिए सक्रिय है, बड़ी कंपनियों के लिए मूर्छित अवस्था मे मूक बनकर देखते है। हम जैसे लेखकों व निर्देशकों के लिए जो फिल्म मे वो सारी कहानी कहना या दिखाना चाहते है जो सच्ची है , समाज मे हो रही घटनाओं पर आधारित है, अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र और संस्कृति को विकृत किया जा रहा है उन विषयों पर है, यह एक कठिन कार्य है किन्तु मैंने बीड़ा उठाया है तो करके ही दम लूँगा...हार नहीं मानूँगा - लेखक-निर्देशक सुमित सिन्हा

मेरे लिए चुनौती है अनर्गल व अश्लील फिल्मों के दौर मे अच्छी कहानी दिखाना

सेंसर बोर्ड तो सिर्फ छोटे प्रॉडक्शन कंपनी के लिए सक्रिय है, बड़ी कंपनियों के लिए नहीं।  बड़ी कंपनियाँ अपने फिल्मों मे गालियों का प्रयोग ज़ोरों पर कर रही है... अश्लीलता बहुत परोस रहीं है। दुअर्थी भाषा का प्रयोग जोरों पर है, यूट्यूब, ओटीटी, चैनेल्स पर देखिये...इन्हे रोकने वाला कोई नहीं... अब तो हर गली मोहल्ले मे ओटीटी लौंच हो रहा है...और गंदगी ही परोसी जा रही है....

भारत सरकार रोकने मे असक्षम है, समाज सुषुप्ता अवस्था मे है और जाग रहे हैं वो जीहाद करने मे लगे है... 

अच्छी फिल्मे बनती है तो दर्शकों तक नहीं पहुँच पाती...बननेवाला गुमनाम, उसकी फिल्म गुमनाम, प्रोड्यूसर का करोड़ों का नुकसान और एक साहसी प्रोड्यूसर की दम घुटने से मौत हो जाती है, वह दुबारा कभी इस प्रकार की फिल्म बनाने की नहीं सोचता और निर्देशक विवश होकर उसी ग्रुप मे चला जाता है जो गंदगी फैला रहें हैं।  

मेरी आनेवाली फिल्म को दर्शकों का पूर्ण सहयोग चाहिए.... बहुल आबादी को यह कहानी आसानी से समझ मे नहीं आएगी क्यूंकि उर्दू  जबान का इस्तेमाल बहुत हुआ है और कहानी की पृष्ठभूमि ही ऐसी है.... मानवता को गोलियों से भूननेवाले अपने घरों मे कैसे नारी के अरमानों को रौंदते है, कैसे हर जगह पर अंकुश लगा देते है और कैसे वह केवल काले लिबास मे चलनेवाली बूत बनकर रह जाती है, न उसका कोई नाम रह जाता है, नहीं ही कोई पहचान, यही इस फिल्म मे दिखाया जानेवाला है। 

दर्शको पसंद आएगी बस देखना है कि ओटीटी चलनेवालों के अधिपत्य का शिकार न बन जाए...